पेपर लीक: जब मेहनत हार जाती है और सिस्टम कटघरे में खड़ा दिखाई देता है।********रेणु सेमवाल की कलम से ✍🏻

पेपर लीक: जब मेहनत हार जाती है और सिस्टम कटघरे में खड़ा दिखाई देता है।********रेणु सेमवाल की कलम से ✍🏻

आज देश का युवा सिर्फ बेरोजगारी से परेशान नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से भी टूटा हुआ है जो हर बार उसके सपनों के साथ खिलवाड़ करती दिखाई देती है।एक गरीब किसान का बेटा, मजदूर की बेटी, मध्यम वर्गीय परिवार का वह बच्चा जो दिन-रात किताबों में अपना भविष्य तलाशता है — आज वही युवा सबसे ज्यादा ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

कारण सिर्फ एक है ________ पेपर लीक आज प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के लिए उम्मीद का रास्ता कम और मानसिक प्रताड़ना का माध्यम ज्यादा बनती जा रही हैं वर्षों की मेहनत, लाखों रुपये की कोचिंग फीस, किराया, किताबें, ऑनलाइन टेस्ट सीरीज़, फॉर्म फीस, सफर का खर्च — सब कुछ दांव पर लगाकर युवा परीक्षा हॉल तक पहुंचता है।लेकिन परीक्षा के बाद जब मोबाइल स्क्रीन पर एक खबर चमकती है ________“पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द”तब सिर्फ एग्जाम नहीं टूटता, किसी का आत्मविश्वास टूटता है, किसी का परिवार टूटता है और कई बार तो किसी युवा की जिंदगी तक बिखर जाती है।सबसे दुखद बात यह है कि यह घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही हैं।कभी शिक्षक भर्ती, कभी पुलिस भर्ती, कभी पटवारी, कभी क्लर्क, कभी रेलवे, तो कभी मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं — हर जगह वही कहानी।देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET तक इस दाग से अछूती नहीं रही।वह परीक्षा जिसमें लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर बैठते हैं, जहां एक-एक नंबर भविष्य तय करता है, वही परीक्षा बार-बार विवादों और पेपर लीक के आरोपों में घिरती रही।सोचिए उस छात्र की मानसिक स्थिति क्या होती होगी जिसने दो-दो साल ड्रॉप लेकर तैयारी की हो, परिवार ने जमीन बेचकर कोचिंग कराई हो, मां-बाप ने अपने सपनों को रोककर बच्चे के सपनों को आगे बढ़ाया हो _____ और फिर खबर आए कि परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ गए हैं।यह सिर्फ परीक्षा नहीं होती, यह लाखों परिवारों की उम्मीदों की लड़ाई होती है।

आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मेहनत करने वाला युवा खुद से सवाल पूछने लगा है _______“क्या सच में मेहनत का कोई मतलब बचा है?”“क्या नौकरी अब पढ़ाई से नहीं, सेटिंग और पैसों से मिलेगी?”“क्या ईमानदार छात्र सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए हैं?”यही सवाल इस देश के सिस्टम पर सबसे बड़ा तमाचा हैं।सरकारें हर बार सख्त कानूनों की बात करती हैं।पेपर लीक रोकने के लिए विशेष कानून बनाए जाते हैं।कहीं उम्रकैद का प्रावधान, कहीं करोड़ों के जुर्माने, कहीं गैंगस्टर एक्ट जैसी धाराएं लगाई जाती हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जब इतने कानून पहले से मौजूद हैं, तो आखिर अपराधी डर क्यों नहीं रहे?????साफ है — समस्या सिर्फ कानून की नहीं, नीयत और व्यवस्था की भी है।जब परीक्षा कराने वाली एजेंसियों में पारदर्शिता कमजोर हो,जब गोपनीयता की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों में रह जाए,जब भ्रष्ट लोग सिस्टम के भीतर बैठे हों,जब जांच सालों तक खिंचती रहे,और जब

दोषियों को सजा मिलने में इतनी देर हो जाए कि समाज भूल जाए ______तब अपराधियों का हौसला बढ़ना तय है।आज देश का युवा सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा, वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है।

युवा की सोच_____“अगर मैं मेहनत करूं, तो कम से कम मेरा भविष्य बिकना नहीं चाहिए।”यह स्थिति सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुकी है।क्योंकि जब मेहनती छात्र बार-बार हारता है और गलत तरीके अपनाने वाले आगे निकल जाते हैं, तब समाज के भीतर ईमानदारी मरने लगती है।फिर युवा के मन में यह जहर पैदा होता है कि “सिस्टम में सब चलता है।”और जिस दिन किसी देश का युवा सिस्टम से भरोसा खो देता है, उसी दिन राष्ट्र की नींव कमजोर होने लगती है।

अब सवाल उठता है __________बदलने की जरूरत किसे है?______सिस्टम को या युवा को???????सच यही है कि सबसे ज्यादा बदलने की जरूरत सिस्टम को है।युवा आज भी मेहनत कर रहा है।वह आज भी रात-रातभर जाग रहा है।आज भी हजारों किलोमीटर दूर जाकर परीक्षा दे रहा है।लेकिन उसे बदले में क्या मिल रहा है?रद्द परीक्षाएं, लंबित रिजल्ट, पेपर लीक और खोखले आश्वासन।अब समय आ गया है कि सिर्फ बयानबाजी नहीं, ठोस कार्रवाई हो।आखिर क्या होना चाहिए?परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और ट्रैकिंग सिस्टम से लैस हो।पेपर सेटिंग से लेकर वितरण तक हर स्तर पर जवाबदेही तय हो।जिन अधिकारियों की लापरवाही सामने आए, उन पर भी उतनी ही सख्त कार्रवाई हो जितनी माफियाओं पर होती है।पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएं ताकि महीनों नहीं, हफ्तों में फैसला आए।दोषियों की संपत्ति जब्त हो और उन्हें सार्वजनिक रूप से उदाहरण बनाया जाए ताकि अगली बार कोई लाखों युवाओं का भविष्य बेचने की हिम्मत न करे।भर्ती परीक्षाओं की मॉनिटरिंग के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय एजेंसी बनाई जाए जिस पर राजनीतिक दबाव न हो।लेकिन इसके साथ समाज और युवाओं की भी जिम्मेदारी है।अगर कुछ लोग पैसे देकर पेपर खरीदने की कोशिश करेंगे, शॉर्टकट तलाशेंगे, तो यह बीमारी कभी खत्म नहीं होगी।गलत रास्ता अपनाने वालों का सामाजिक बहिष्कार भी जरूरी है।आज जरूरत सिर्फ कानून बनाने की नहीं, भरोसा बचाने की है।क्योंकि युवा सिर्फ देश का भविष्य नहीं होता, वह वर्तमान की ताकत भी होता है।अगर वही निराश हो गया, तो देश की प्रगति सिर्फ भाषणों में रह जाएगी।

याद रखिए ______पेपर लीक सिर्फ एक अपराध नहीं है।यह लाखों सपनों की हत्या है।यह गरीब मां-बाप की उम्मीदों का अपमान है।यह मेहनत का मजाक है।और यह उस भारत के चेहरे पर धब्बा है जो खुद को युवा शक्ति का देश कहता है।

अब फैसला इस देश की व्यवस्था को करना है _____क्या वह युवाओं का भरोसा बचाएगी,या हर रद्द होती परीक्षा के साथ एक और पीढ़ी को टूटते हुए देखती रहेगी।

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