हर्षोल्लाह के साथ मनाया गया पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी जी का 137वां उपकार दिवस

हर्षोल्लाह के साथ मनाया गया पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी जी का 137वां उपकार दिवस दिनांक 10 मई 2026 को श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय भवन में पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी जी का 137वां उपकार दिवस अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से पद्मश्री डॉ. आर.के. जैन, सुनील जैन (तुलाज यूनिवर्सिटी), विनोद जैन (अध्यक्ष जैन समाज,) राजीव जैन (फार्म हाउस), (हिमाचल टाइम्स) की ऑनर इंद्राणी पांधी जी एवं प्रवीण जैन उपस्थित रहे।प्रातःकाल सभी श्रद्धालुओं ने सरनीमल मंदिर में जिनेंद्र पूजन में भाग लिया, तत्पश्चात पूज्य गुरुदेव श्री का मंगलमय सीडी प्रवचन श्रवण किया गया। इसके उपरांत वीतराग विज्ञान पाठशाला की संरक्षिका श्रीमती वीना जैन के निर्देशन एवं अथक प्रयासों से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया।कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि कार्यक्रम में अनेक धार्मिक, ज्ञानवर्धक एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी गईं। गुरुदेव वंदना, नाटक एवं बच्चों की प्रस्तुतियाँ विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। पुरुषों ने भी वंदना के माध्यम से अपने भावों की सुंदर प्रस्तुति दी।कार्यक्रम के अंतर्गत जिनेंद्र प्रक्षाल, जिनेंद्र पूजन, देव भक्ति, “जागो चेतन जागो”, “चेतना के नाद से”, “गुरुदेव आए रे बड़े ही सौभाग्य से”, पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी का मंगल सीडी प्रवचन, पंच परमेष्ठी वंदना, “बताया मुक्ति पंथ सरल सीधा बेमिसाल”, “ध्रुव रूप रहो मम अंतर में”, “आचार्य कुंदकुंद भारत में फिर आओ”, “जय समयसार”, कलश पाठशाला, “प्रभु स्वाश्रित जीवन हो”, “तू ही शुद्ध है, तू ही बुद्ध है”, कव्वाली एवं “मैं लौटकर निगोद फिर जाऊँगा नहीं” जैसी भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।इस अवसर पर वीना जैन ने कहा कि पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी का जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं था, बल्कि आत्मजागरण, तत्त्वज्ञान एवं सम्यक दर्शन की दिव्य ज्योति था। उन्होंने अपने तप, त्याग, गहन अध्ययन एवं निष्पक्ष तत्त्वचर्चा के माध्यम से अनगिनत जीवों को आत्मा की ओर मोड़ा।उन्होंने कहा कि गुरुदेव का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, करुणामय एवं प्रभावशाली था। वे बाह्य आडंबरों से दूर रहकर आत्मकल्याण एवं जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में निरंतर रत रहे। पूज्य गुरुदेव ने सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक चरित्र जैसे मूल जैन सिद्धांतों को अत्यंत सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाया।उन्होंने हमें जो सबसे बड़ी निधि दी, वह है — शुद्ध आत्मा का बोध।उन्होंने समझाया कि —“मैं शरीर नहीं, मैं शुद्ध आत्मा हूँ।”यही भावना जीवन का वास्तविक मोड़ है।पूज्य गुरुदेव ने समयसार जैसे महान ग्रंथों का सार सरल शब्दों में समझाकर जीवों को आत्मानुभूति का मार्ग दिखाया। उन्होंने बार-बार बताया कि जीव की सबसे बड़ी भूल मिथ्यात्व है तथा सही श्रद्धा और सही दृष्टि ही मोक्षमार्ग का द्वार खोलती है।गुरुदेव ने केवल प्रवचन नहीं दिए, बल्कि विनय, करुणा, संयम, स्वाध्याय एवं आत्मचिंतन से युक्त जीवन जीने की कला सिखाई। उनके प्रवचनों, शिविरों, बालशालाओं, जिनमंदिर निर्माण एवं तत्त्वचर्चाओं से हजारों परिवार धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए।उन्होंने जीवों को यह विश्वास दिलाया कि —“तू बना बनाया भगवान है,केवल अपनी भूल मिटानी है।”आज भी उनका संदेश, उनका तप एवं उनका तत्त्वज्ञान असंख्य आत्माओं के लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है।कार्यक्रम में सुभाष जैन, महेश जैन, संजीव जैन, दिनेश जैन, नरेश चंद जैन, डॉ. संजय जैन, सचिन जैन, राजेंद्र जैन, अजय जैन, अनिल जैन, श्रीमती वीना जैन, कविता जैन, बबिता जैन, वंदना जैन, प्रीति जैन, दीपशिखा जैन, संध्या जैन, अनुभा जैन आदि उपस्थित रहे।मधु सचिन जैनमीडिया समन्वयकजैन समाज

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