गालीबाज मासूम शर्मा का देवभूमि में आना उत्तराखंड के स्वाभिमान पर सीधी चोट::::::::अनिल रमोला

गालीबाज मासूम शर्मा का देवभूमि में आना उत्तराखंड के स्वाभिमान पर सीधी चोट::::::::अनिल रमोला

स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा और बाहरी कलाकारों पर लाखों खर्च करने की नीति पर उठाए सवाल

गालीबाज मासूम शर्मा का देवभूमि में आना उत्तराखंड के स्वाभिमान पर सीधी चोट::::::::अनिल रमोला

देहरादून। 🌿🌿🌿🌿🌿🌿उत्तराखंड की देवभूमि में बाहरी कलाकारों को मंच और प्राथमिकता दिए जाने तथा प्रदेश के अपने लोक कलाकारों की लगातार उपेक्षा को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार अनिल रमोला ने कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश की अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगीत और लोक कलाकारों की देशभर में अलग पहचान है, उसी प्रदेश में स्थानीय कलाकारों को उचित सम्मान और प्राथमिकता न मिलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अनिल रमोला ने कहा कि मासूम शर्मा जैसे विवादित और कथित तौर पर गाली-गलौज वाली भाषा के लिए चर्चित कलाकार को देवभूमि में मंच देना उत्तराखंड के स्वाभिमान और सांस्कृतिक मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करने वाले स्थानीय कलाकारों को मंच देने के बजाय बाहरी कलाकारों को बुलाकर भारी भरकम भुगतान करना समझ से परे है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि हमारे पहाड़ी कलाकारों ने अपनी पूरी जिंदगी उत्तराखंड की संस्कृति, बोली-भाषा और लोक परंपराओं को बचाने में लगा दी। इसके बावजूद कई स्थानीय कलाकारों को कार्यक्रमों का भुगतान पाने के लिए महीनों और वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। कई बार उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज उठाने के बाद ही भुगतान मिल पाता है। वहीं दूसरी ओर बाहरी कलाकारों के लिए आयोजन से पहले ही बड़ी राशि बतौर एडवांस देने और कार्यक्रम समाप्त होते ही शेष भुगतान करने की व्यवस्था पर भी उन्होंने सवाल उठाया। अनिल रमोला ने कहा, “क्या यही वह उत्तराखंड है, जिसके लिए राज्य आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया? क्या इसी व्यवस्था का सपना हमारे आंदोलनकारियों और शहीदों ने देखा था? जब अपने कलाकार सम्मान और भुगतान के लिए संघर्ष कर रहे हों और बाहरी कलाकारों पर लाखों रुपये खर्च किए जाएं, तो यह निश्चित रूप से विचार करने का विषय है। ”उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के कलाकार केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की संस्कृति और पहचान के वाहक हैं। सरकार और आयोजन समितियों को चाहिए कि स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता दें, उनके लंबित भुगतानों का समयबद्ध निस्तारण करें और प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता के अनुरूप कलाकारों का चयन किया जाए। अनिल रमोला ने मांग की कि उत्तराखंड में होने वाले सरकारी एवं बड़े सार्वजनिक आयोजनों में स्थानीय कलाकारों के लिए स्पष्ट प्राथमिकता और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी कलाकार को अपने मेहनताने के लिए सार्वजनिक रूप से गुहार लगाने की नौबत न आए।उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक कलाकार के खिलाफ नहीं, बल्कि उत्तराखंड के कलाकारों के सम्मान, संस्कृति और स्वाभिमान की लड़ाई है।