विकास के नाम पर उत्तराखंड की प्रकृति से खिलवाड़ कब तक?
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, नदियों और शांत वातावरण के लिए पूरे देश में जाना जाता है। लेकिन आज विकास के नाम पर जिस तरह से अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और बड़े-बड़े निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, उसने राज्य के पर्यावरण और दून घाटी के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।देहरादून में राष्ट्रपति भवन के आसपास राजपुर रोड पर सैकड़ों पेड़ों की कटाई की गई। सहस्त्रधारा रोड पर भी बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए। जनजागरण और पर्यावरण प्रेमियों के संघर्ष से खलंगा क्षेत्र में लगभग 4000 पेड़ों की कटाई पर फिलहाल रोक लग सकी, लेकिन अब भानियावाला–ऋषिकेश मार्ग के सौंदर्यीकरण के नाम पर सात मोड़ जैसे प्राकृतिक और रमणीय क्षेत्र को भी प्रभावित किया जा रहा है।प्रश्न यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें चौड़ी करना और पेड़ों की बलि देना रह गया है? जब शहर के भीतर जलभराव, टूटी सड़कें, जाम, कूड़ा प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं जैसी समस्याएँ आज भी जस की तस हैं, तब प्राथमिकता इन समस्याओं के समाधान को क्यों नहीं दी जा रही?देहरादून की जीवनदायिनी रिस्पना और बिंदाल नदियाँ आज कूड़े और मलबे से पट चुकी हैं। बरसात में यही स्थिति जलभराव और बाढ़ जैसी समस्याओं को जन्म देती है, जिससे आम नागरिकों का जीवन प्रभावित होता है। इन नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।वहीं, दिल्ली–देहरादून हाईवे पर कई स्थानों पर भूस्खलन, धंसती सड़कें और सुरक्षा संबंधी खामियाँ लगातार सामने आ रही हैं। यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।उत्तराखंड के नागरिक सरकार से विकास का विरोध नहीं, बल्कि संतुलित, वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल विकास की अपेक्षा रखते हैं। विकास ऐसा हो जो प्रकृति, जंगलों, जलस्रोतों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा भी करे।
हम सरकार से मांग करते हैं कि—अनावश्यक पेड़ों की कटाई पर तत्काल रोक लगाई जाए।
प्रत्येक बड़ी परियोजना का पारदर्शी पर्यावरणीय मूल्यांकन कराया जाए।
रिस्पना और बिंदाल नदियों के पुनर्जीवन के लिए प्रभावी कार्ययोजना लागू की जाए।
शहर की मूलभूत समस्याओं—जलभराव, टूटी सड़कें, कूड़ा प्रबंधन और यातायात—को प्राथमिकता दी जाए।
दिल्ली–देहरादून हाईवे की सुरक्षा संबंधी कमियों को तत्काल दूर किया जाए।

उत्तराखंड का विकास उसकी प्रकृति को बचाकर ही संभव है। यदि जंगल, नदियाँ और दून घाटी सुरक्षित नहीं रहेंगी, तो विकास का कोई भी मॉडल स्थायी नहीं होगा।
