17 वर्षीय अभिजीत ने मौत को दी मात: प्लेटलेट्स 17 हजार से बढ़कर 1.40 लाख, डॉक्टरों की मेहनत और सामाजिक सहयोग से मिली नई जिंदगी
देहरादून।

झारखंड के जमशेदपुर स्थित सुंदरनगर निवासी 17 वर्षीय अभिजीत (पुत्र देव नाथ) ने गंभीर हालत से जूझते हुए आखिरकार जिंदगी की जंग जीत ली। एक समय ऐसा था जब उनकी हालत बेहद नाजुक हो गई थी और वे बेहोश हो गए थे, लेकिन चिकित्सकों की अथक मेहनत, अस्पताल प्रशासन की संवेदनशीलता और समाजसेवियों के सहयोग से आज उनकी सेहत में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
परिजनों के अनुसार, अभिजीत को सबसे पहले जिला अस्पताल हरिद्वार में भर्ती कराया गया, जहां जांच में उनके प्लेटलेट्स मात्र 17 हजार पाए गए। अस्पताल में केवल एक यूनिट प्लेटलेट्स उपलब्ध था, जबकि उनका ब्लड ग्रुप AB पॉजिटिव होने के कारण पर्याप्त प्लेटलेट्स की व्यवस्था नहीं हो सकी। इसके बाद उन्हें रुड़की रेफर किया गया, लेकिन वहां भी आवश्यक प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं हो पाए।
गंभीर स्थिति को देखते हुए परिजन उन्हें उच्च चिकित्सा संस्थानों में लेकर पहुंचे। एम्स में चिकित्सकों ने आईसीयू में बेड उपलब्ध न होने तथा संक्रमण के बढ़ते खतरे के कारण भर्ती को लेकर कठिनाइयों की जानकारी दी। इसके बाद जौलीग्रांट सहित अन्य अस्पतालों में भी प्रयास किए गए, लेकिन झारखंड का आयुष्मान कार्ड उत्तराखंड में मान्य न होने के कारण उपचार में लगातार बाधाएं आती रहीं।
अंततः अभिजीत को दून अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां भी आयुष्मान कार्ड लागू नहीं हो सका, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अस्पताल प्रशासन ने उनके उपचार का बिल पूरी तरह माफ कर दिया।
करीब 10 दिनों तक आईसीयू में गहन उपचार के बाद अभिजीत की स्थिति में लगातार सुधार हुआ। अब उन्हें आईसीयू से सामान्य वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि उनके प्लेटलेट्स 17 हजार से बढ़कर 1 लाख 40 हजार तक पहुंच चुके हैं, जिसे चिकित्सक उनके स्वास्थ्य लाभ की दिशा में बड़ी सफलता मान रहे हैं।
इस पूरे उपचार के दौरान डॉ. अशोक एवं उनकी पूरी चिकित्सा टीम ने समर्पण और संवेदनशीलता के साथ लगातार इलाज किया। वहीं पिछले 16 वर्षों से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सक्रिय NEBA Care Foundation ने भी हर स्तर पर परिवार का सहयोग किया।

अभिजीत के पिता देव नाथ ने भावुक होते हुए बताया कि इस कठिन समय में उन्हें कई ऐसे लोगों का साथ मिला, जिन्होंने परिवार को कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने विशेष रूप से रेड क्रॉस सोसाइटी के आंदोलनकारी एवं कोषाध्यक्ष मोहन सिंह खत्री का आभार व्यक्त करते हुए उन्हें अपने परिवार के लिए “देवदूत” बताया। उन्होंने कहा कि जहां कई बार अपने भी साथ छोड़ देते हैं, वहीं मोहन सिंह खत्री ने उनके बेटे के उपचार में हरसंभव सहयोग कर मानवता की मिसाल पेश की।
गौरतलब है कि मोहन सिंह खत्री अब तक 150 से अधिक रक्तदान शिविरों का आयोजन कर हजारों जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। अभिजीत के पिता ने कहा कि उत्तराखंड को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता। यहां सेवा और मानवता की भावना आज भी जीवित है, और मोहन सिंह खत्री जैसे समाजसेवी इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि “मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।”
__________उन्होंने सरकार से भी आग्रह किया कि ऐसे निस्वार्थ भाव से समाज और स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान देने वाले लोगों को विभिन्न स्वास्थ्य एवं जनकल्याण आयोगों में स्थान देकर उनके अनुभव और सेवाभाव का लाभ समाज तक पहुंचाया जाए।
वर्तमान में अभिजीत की स्थिति पहले की अपेक्षा काफी बेहतर है। परिवार ने दून अस्पताल के चिकित्सकों, अस्पताल प्रशासन, NEBA Care Foundation तथा सभी सहयोगकर्ताओं के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग के कारण ही आज उनका बेटा एक नया जीवन प्राप्त कर सका।
