देहरादून की पत्रकारिता के साक्षी: वरिष्ठ पत्रकार रविंद्रनाथ कौशिक से भेंट

देहरादून की पत्रकारिता के साक्षी: वरिष्ठ पत्रकार रविंद्रनाथ कौशिक से मुलाकात कल उत्तरांचल प्रेस क्लब देहरादून में उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार श्री रविंद्रनाथ कौशिक जी से आत्मीय भेंट हुई।

मिलते ही उन्होंने कहा—”मैं आपके लेख नियमित पढ़ता हूँ। आप बहुत अच्छा लिखते हैं।” एक वरिष्ठ पत्रकार के मुख से निकले ये शब्द मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं थे।रविंद्रनाथ कौशिक जी को मैं वर्षों से जानता हूँ। उनकी सफेद दाढ़ी, सादगी और शांत व्यक्तित्व उन्हें अलग पहचान देते हैं। बातचीत के दौरान मैंने उनकी पत्रकारिता यात्रा के बारे में जानना चाहा। उन्होंने बताया कि उनकी पत्रकारिता की शुरुआत 1968 में हुई थी। उस समय वे लोकप्रिय पत्रिका ‘सरिता मुक्ता ‘ के लिए लेखन करते थे। उनके सक्रिय पत्रकार होने के दस्तावेजी प्रमाण 1978 से मिलते हैं, जब वे देहरादून के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दून दर्पण’ से जुड़े। और उत्तर प्रदेश के अनेक दिग्गज नेताओं—बाबू जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह सहित कई राष्ट्रीय नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस और जनसभाओं की रिपोर्टिंग की।दून दर्पण उस समय देहरादून का अत्यंत प्रभावशाली समाचार पत्र था। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में साप्ताहिक के रूप में हुई और बाद में आपातकाल से पहले यह दैनिक समाचार पत्र बन गया। उस दौर में दून दर्पण ने उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र और देहरादून की पत्रकारिता को नई पहचान दी। कौशिक जी ने अपने समकालीन पत्रकारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस समय देवदत्तबाली दैनिक अर्जुन , पंडित खुशदिल, टेकचंद गुप्ता, देहरा पत्रिका, सत्यदेव स्वामी जनता एक्सप्रेस से जुड़े कई पत्रकार सक्रिय थे। और वह स्वयं सरिता मुक्ता से जुड़े थे। उन्होंने भावुक होकर कहा कि आज उस पीढ़ी के अधिकांश पत्रकार हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने यह भी बताया कि सत्यदेव स्वामी अंग्रेज़ी शासनकाल में देहरादून के अंतिम कोतवाल रहे थे और बाद में पत्रकारिता से जुड़े। यह तथ्य देहरादून के प्रशासनिक और पत्रकारिता इतिहास का एक रोचक अध्याय है। देहरादून के पुराने सर्किट हाउस, जो घण्टाघर के पास था, उस दौर की पत्रकारिता, रेलवे स्टेशन की राजनीतिक हलचल और उन वरिष्ठ पत्रकारों को भी याद दिलाता है, जिन्होंने अपनी कलम से देहरादून की पत्रकारिता को पहचान दिलाई।ब्रिटिश शासनकाल में देहरादून अंग्रेज़ी शिक्षा और अंग्रेज़ी पत्रकारिता का प्रमुख केंद्र बन गया था। स्वतंत्रता के बाद भी 1960, 1970 और 1980 के दशक तक अंग्रेज़ी पत्रकारिता का प्रभाव अधिक रहा। इसके बावजूद रविंद्रनाथ कौशिक, देवेंद्र भसीन, गिरिजाशंकर त्रिवेदी, आचार्य गोपेश्वर प्रसाद कोठियाल युगवाणी, राधा कृष्ण कुकरेती नया जमाना जैसे एकाधिक पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता को मजबूत आधार दिया। उनकी लेखनी और जनसरोकारों ने देहरादून में हिंदी पत्रकारिता की अलग पहचान स्थापित की और उसे सशक्त परंपरा के रूप में आगे बढ़ाया।

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