22 सितम्बर 2025, आश्विन शुक्ल 1
शारदीय नवरात्रि_________नवरात्रि –
नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है।




घट स्थापना हेतु शुभ मुहूर्त –
दिनांक : 22 सितम्बर 2025_____प्रातः
06:09 से 07:46,,,,,,,,,,,,,09:17 से 10:48_____अभिजीत मुहूर्त
सुबह 11 बजकर 55 मिनट से
दोपहर 12 बजकर 43 मिनट तक______दोपहर
03:21 से 04:52
सायं______04:52 से 07:52

हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गन व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। इन 9 दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है ।
माँ की आराधना –
नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों – महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है

नौ देवियाँ :
शैलपुत्री – इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
ब्रह्मचारिणी – इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
चंद्रघंटा – इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
कूष्माण्डा – इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
स्कंदमाता – इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
कात्यायनी – इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
कालरात्रि – इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
महागौरी – इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
सिद्धिदात्री – इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।
नवरात्रि के पहले तीन दिन :
नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।
नवरात्रि के चौथा से छठे दिन :
व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।
नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन :
सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक ‘यज्ञ’ किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।
नवरात्रि का नौवां दिन :
नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन होता है। उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े भेंट किए जाते हैं।

नवरात्री में इस प्रकार करे माता का पूजन
नवरात्रि पूजा विधि
नवरात्रि का त्योहार साल मे दो बार आता है। एक बार होली के महीने में जिसे चैत्र नवरात्रि कहा जाता है और दूसरी बार कार्तिक के महीने में दशहरे के पहले जिसे शारदीय नवरात्रि कहते हैं। दोनो ही बार 9 दिन मां के नौ रुपों की पूजा की जाती है। आठवें दिन मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन कन्या पूजन भी होता है।
इन नवरात्री में माताजी की पूजा हेतु विधि, पूजन सामग्री और आरती के जानकारी इस लेख के माध्यम से आपको दी जा रही है. इस विधि अनुसार माताजी का पूजन कर आप उनका आशीष पा सकते है.
नवरात्रि पूजा सामग्री –
नवरात्री व्रत और पूजा 9 दिन तक चलती है इसलिये कुछ विशेष सामग्री इसके लिये जरूरी होती है। पूजा के लिये सबसे पहले तो –

- मां दुर्गा की एक प्रतिमा,,,,,,दुर्गा सप्तशती,,,,,,कलश, रेत, जौ, आम के पत्ते और नारियल,,,,,,तिलक, मौली, चावल, पान, सुपारी,,,,,,लौंग, इलायची, अभिर, सिंदूर, गुलाल,,,,,,,धूप, दीप, घी, बाती,,,,,कमल, गुलाब के साथ अन्य फूल,,,,,, फल
- आसन, लाल कपड़ा
कलश और जौं –
सबसे पहले रेत को एक जगह रख लें। उस पर कुछ जौं डाल दें। जौं पर शुद्ध जल का छिड़काव करें। इसके उपर कलश रख दें। कल में आम के पत्ते रखें और फिर नारियल को मौली बांध कर कलश पर रख दें। कलश पर स्वास्तिक बनाएं और फिर उसमें गंगा जल डाल दें। कलश को शुद्ध जल से भर दें। कलश में सुपारी, सिक्का और फूल डालें। कलश के उपर आम के पत्ते रखे दें और फिर उसके उपर नारियल। उपर चावल से ढंक दें। ध्यान रहे जो कलश आप स्थापित कर रहे है वह मिट्टी, तांबा, पीतल , सोना या चांदी का होना चाहिए। भूल से भी लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग नहीं करे.
मां की चौकी ________लकड़ी की एक साफ सुधरी चौकी रखें।”””””””गंगाजल छिड़का कर उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।,,,,,,,,,,इसे कलश के दाहिने तरफ रखें। मां की प्रतिया या फोटो स्थापित करें। धूप और दीप करें। एक ज्योत ऐसी रखें जो कि नौ दिन तक जलती रहे।_______मां को फल, फूल अर्पित करें। चुनरी चढ़ाएं, श्रृंगार करें।,,,,,,,,,धूप जलाकर अराधना और आरती करें।”””””””नौ दिन करें रोज पूजा,,,,,,,अधिकतर लोग नौ दिन तक व्रत रखते हैं तो उन्हें नौ दिन ही पूजा पाठ करना जरूरी है। ध्यान रहे कि वो अन्न ना खाएं। सिर्फ फलाहार ही लें।,,,,,,,,दुर्गा सप्तशती या दुर्गा कवच का पाठ करें,,,,,,,मां के मंदिर जाएं,,,,,,,,,अष्टमी , नवमी के दिन कन्या पूजन जरूर करें
दुर्गा मां की आरती ,,,,,,,,,जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ टेक ॥,,,,,,,मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रबदन नीको ॥ जय,,,,,,,कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।
रक्त पुष्प गलमाला, कण्ठन पर साजै ॥ जय,,,,,,,,केहरि वाहन राजत, खड़ग खप्परधारी ।
सुर नर मुनिजन सेवक, तिनके दुखहारी ॥ जय,,,,,,कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥ जय,,,,,,,शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ जय,,,,,,,चण्ड मुण्ड संघारे, शोणित बीज हरे ।
मधुकैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥ जय,,,,,,ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ जय,,,,,,,,चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरुं ।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु ॥ जय,,,,,,,,तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता ।
भक्तन् की दुःख हरता, सुख-सम्पत्ति करता ॥ जय,,,,,,,,,भुजा चार अति शोभित, खड़ग खप्परधारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ जय,,,,,,,,,कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥ जय,,,,,,,,श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥ जय


देवी वन्दना__________या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता|
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:||

नवरात्रि – पौराणिक कथा______
शास्त्रों में नवरात्रि का त्योहार मनाए जाने के पीछे दो कारण बताए गए हैं। पहली पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नाम का एक राक्षस था जो ब्रह्मा जी का बड़ा भक्त था। उसने अपने तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके एक वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान में उसे कोई देव, दानव या पृथ्वी पर रहने वाला कोई मनुष्य मार ना पाए। वरदान प्राप्त करते ही वह बहुत निर्दयी हो गया और तीनो लोकों में आतंक माचने लगा। उसके आतंक से परेशान होकर देवी-देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ मिलकर माँ शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इस दिन को अच्छाई पर बुराई की जीत के रूप में मनाया जाता है।
एक दूसरी कथा के अनुसार, भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले और रावण के संग युद्ध में जीत के लिए शक्ति की देवी माँ भगवती की आराधना की थी। रामेश्वरम में उन्होंने नौ दिनों तक माता की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने श्रीराम को लंका में विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन भगवान राम ने लकां नरेश रावण को युद्ध में हराकर उसका वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन को विजय दशमी के रूप में जाना जाता है।
नवरात्रि में राशि अनुसार उपाय_______इस नवरात्रि क्या कहती है आपकी राशि, जाने नवरात्रि में राशि अनुसार उपाय –
- मेष राशि (Aries)
माँ दुर्गा के माँ शैलपुत्री रूप की उपासना करें।
“ॐ दुं दुर्गायै नमः” मंत्र का जप करें।
मंगलवार व शनिवार को गुड़ और लाल फूल अर्पित करें।
उपाय: तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें लाल पुष्प डालकर माता को अर्पित करें। - वृषभ राशि (Taurus)
माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना करें।
शुक्रवार को सफेद फूल और मिश्री अर्पित करें।
घर में शांति और सुख-समृद्धि हेतु माँ को दुग्ध से स्नान कराएँ।
उपाय: घर के उत्तर-पूर्व कोने में घी का दीपक जलाएँ। - मिथुन राशि (Gemini)
माँ चंद्रघंटा की पूजा करें।
बुधवार को हरे वस्त्र पहनकर माँ को हरे पत्ते और इलायची चढ़ाएँ।
मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”।
उपाय: कन्याओं को हरे वस्त्र या बर्तन दान करें। - कर्क राशि (Cancer)
माँ कूष्मांडा की आराधना करें।
चाँदी या मिट्टी के पात्र में जल भरकर माँ को अर्पित करें।
सोमवार को चावल और दुग्ध से भोग लगाएँ।
उपाय: गरीबों को दूध और चावल का दान करें। - सिंह राशि (Leo)
माँ स्कंदमाता की पूजा करें।
लाल वस्त्र धारण करें।
सूर्य उदय के समय माँ को लाल पुष्प और गेंहू का भोग लगाएँ।
उपाय: जरूरतमंद कन्याओं को लाल वस्त्र और फल दान करें। - कन्या राशि (Virgo)
माँ कात्यायनी की आराधना करें।
बुधवार और शुक्रवार को हल्दी व पीले फूल अर्पित करें।
पढ़ाई और करियर में सफलता के लिए “ॐ कात्यायनी नमः” मंत्र का जप करें।
उपाय: ब्राह्मण कन्याओं को भोजन कराएँ। - तुला राशि (Libra)
माँ कालरात्रि की पूजा करें।
शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
किसी भी तरह की नकारात्मकता और भय दूर करने हेतु माँ को लौंग अर्पित करें।
उपाय: पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएँ। - वृश्चिक राशि (Scorpio)
माँ महागौरी की आराधना करें।
सफेद वस्त्र धारण करें।
माँ को नारियल, कपूर और चंदन अर्पित करें।
उपाय: जरूरतमंदों को सफेद वस्त्र और चावल दान करें। - धनु राशि (Sagittarius)
माँ सिद्धिदात्री की पूजा करें।
पीले फूल और गुड़ का भोग लगाएँ।
शिक्षा, संतान सुख और भाग्य वृद्धि हेतु “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं” मंत्र जप करें।
उपाय: गुरुजनों और आचार्यों का आशीर्वाद लें। - मकर राशि (Capricorn)
माँ शैलपुत्री और कूष्मांडा दोनों की विशेष पूजा करें।
शनिवार को तिल और तेल का दान करें।
भौतिक सुख-सुविधा और शांति के लिए सफेद पुष्प चढ़ाएँ।
उपाय: श्रमिकों को भोजन कराएँ। - कुंभ राशि (Aquarius)
माँ चंद्रघंटा और कालरात्रि की आराधना करें।
नीले या काले वस्त्र धारण करें।
माँ को नीले फूल और कपूर से आरती करें।
उपाय: गरीब कन्याओं को मिठाई और वस्त्र दें। - मीन राशि (Pisces)
माँ सिद्धिदात्री और महागौरी की पूजा करें।
पीले वस्त्र पहनें और हल्दी का तिलक करें।
भाग्य वृद्धि हेतु “ॐ ह्रीं दुर्गायै नमः” मंत्र जप करें।
उपाय: मंदिर में पीली मिठाई और केले अर्पित करें।
देवी के दिव्यास्त्र_______नव दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है, देवी के अलग-अलग स्वरूपों में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र हैं परंतु ये सब मां आदि शक्ति के ही विभिन्न रूप हैं।
दुर्गा सप्तशती में कहा गया है कि देवी को देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र व हथियार सौपें थे ताकि असुरों के साथ होने वाले संग्रामों में विजय प्राप्त हो व धर्म सदैव स्थापित रहे, अधर्म का नाश हो व सद्मार्ग की गति बनी रहे। देवी के सर्वाधिक अर्थात् अट्ठारह हाथ उनके महा लक्ष्मी स्वरूप में दिखाई देते हैं। इस स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि-
ॐ अक्षस्त्रक्परशुं गदेशुकुलिशं पद्मं धनुषकुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थितां।।_________________इसका अर्थ है कि- ”मैं कमल के आसन पर बैठी हुई प्रसन्न मुख वाली महिषासुरमर्दिनी भगवती महा लक्ष्मी का भजन करता हूं, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घंटा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करती है।”
इनमें से कई प्रमुख दिव्यास्त्र विभिन्न देवताओं द्वारा देवी को अर्पण किए गए हैं।
देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है। कहा गया है ये त्रिशूल भोलेनाथ ने अपने शूल में से निकाल कर मां को सौंपा था।
शक्ति दिव्यास्त्र अग्निदेव ने मां को प्रदान किया था, महिषासुर सहित अनेक दैत्य रथ, हाथी, घोड़ों की सेना के साथ चतुरंगिणी सेना ले कर युद्ध के लिए आए, तब तब देवी मां अपनी इसी शक्ति से उन्हें खदेड़ डालतीं थी। इन सभी का मां ने इसी शक्तिबल से वध किया था।
रक्त बीज व अन्य दैत्यों को मारने के लिए मां ने चक्र का उपयोग किया। अपने भक्तों की रक्षा के लिए मां को यह चक्र लक्ष्मीपति भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उत्पन्न कर के दिया था।
धरती, आकाश व पाताल, तीनों लोकों को अपनी ध्वनि से कम्पायमान कर देने वाला शंख, जब ऊंचे स्वर में युद्ध भूमि में गुंजायमान होता, तब दैत्य, असुर, राक्षसों की सेना भाग खड़ी होती थी। वे डर से कांपने लगते थे। वरुणदेव ने देवी को यह शंख भेंट किया था।
तीनों लोकों के क्षोभग्रस्त हो जाने पर जब दैत्य गण देवी की ओर हथियार ले कर दौड़े तब देवी ने धनुष बाणों के प्रहार से समस्त सेना का नाश किया था. यह धनुष व बाणों के भरे हुए दो तरकश पवन देव ने अर्पित किए थे।
अनेक असुरों व दैत्यों को घंटे के नाद से मूर्छित कर के उनका विनाश करने वाली मां को ऐरावत हाथी के गले से उतर कर एक घंटा भगवान इंद्र ने दिया। साथ ही अपने वज्र से एक और वज्र उत्पन्न किया। वज्र व घंटा देवराज इंद्र ने मां को दिए थे।
चंड-मुंड का नाश करने के लिए मां ने काली का विकराल रूप धारण किया, नरमुंडों की माला, क्रोध से सम्पूर्ण मुख का रंग काला, जीभ बाहर की ओर लटक आई, यह स्वरूप विचित्र खट्वांग धारण किये हुए है। यह युद्ध तलवार व फरसे से लड़ा गया। दैत्यों का संहार हुआ। यह फरसा विश्वकर्मा ने उन्हें भेंट किया था।
नवरात्रि में कामना पूर्ति के उपाय
इस नवरात्रि अपनी मनोकामना के पूर्ति हेतु नो दिन ये उपाय करें -_________आरोग्य पाना चाहते हैं तो नवरात्रि के प्रथम दिन से लेकर अंतिम दिन तक कभी भी गाय का घी लाकर रखें।,,,,,,,,,,,अपना घर चाहते हैं तो मिट्टी का छोटा सा घर लाकर पूजा स्थल में रखें।,,,,,,,,,,,,,,,,,,अगर विदेश यात्रा करना चाहते हैं तो पताका (ध्वजा या परचम) खरीद कर नौ दिनों तक पूजा करें और नवमी के दिन किसी देवी मंदिर में अर्पित करें।,,,,,,,,,,,,,,,,,आर्थिक कष्टों से मुक्ति के लिए चांदी की कोई भी शुभ सामग्री लाकर देवी को समर्पित करें।
5 नौकरी में पदोन्नति चाहते हैं तो 3 नारियल लाकर पहले घर में रखें और नवमी के दिन मंदिर में चढ़ाएं।,,,,,,,,,,,,,,,आकर्षण बढ़ाना चाहते हैं तो धूप, सुगंध, अगरबत्ती, रूई या चमकीली सफेद सामग्री खरीदें।,,,,,,,,,,,,,,,,,सफलता चाहते है तो नवरात्रि के दिन मौली खरीद कर उस पर नौ गांठ लगा कर देवी को समर्पित करें और फिर उसे सदा अपने पास रखने से हर कार्य में सफलता मिलती है।,,,,,,,,,,,,,,अपार धन संपत्ति के लिए इन नौ दिनों में किन्नर से पैसा लेकर तिजोरी या पर्स में रखें।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सौभाग्य में वृद्धि के लिए समस्त सुहाग श्रृंगार सामग्री (कांच, काजल, कुंकु, मंगलसूत्र, चूड़ी, कंघी, बिछिया, चुनरी) खरीदें और काली मां को नवमी के दिन चढ़ाएं।
नवरात्रि में क्या करें / क्या ना करें –___________सात्त्विकता, भक्ति और अनुशासन के साथ इन नियमों का पालन करें।

✅ नवरात्रि में क्या करें
घटस्थापना व कलश पूजन करें – शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करके माँ दुर्गा की उपासना करें।
व्रत रखें – श्रद्धानुसार पूरे 9 दिन या 2 दिन (पहला और आखिरी) उपवास किया जा सकता है।
सात्त्विक भोजन करें – फल, दूध, सूखे मेवे और सेंधा नमक का सेवन करें।
माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा करें – हर दिन माता के अलग-अलग स्वरूप की आराधना करें।
दीपक जलाएँ – अखंड ज्योति या प्रतिदिन घी/तेल का दीपक अवश्य जलाएँ।
मंत्र जप और पाठ करें – दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
कन्या पूजन करें – अष्टमी या नवमी को कन्याओं का पूजन कर उन्हें भोजन व उपहार दें।
दान करें – वस्त्र, भोजन, अनाज, फल और जरूरतमंदों की सहायता करें।
घर को पवित्र और साफ रखें – पूजा स्थान को विशेष रूप से स्वच्छ और सुगंधित रखें।
🚫 नवरात्रि में क्या न करें
मांसाहार और मदिरा का सेवन न करें – यह नवरात्रि के नियमों का उल्लंघन है।
लहसुन-प्याज न खाएँ – व्रत काल में सात्त्विकता बनाए रखना जरूरी है।
बाल, नाखून और दाढ़ी कटवाने से बचें – इसे अशुभ माना जाता है।
क्रोध, झूठ और बुरी बातें न करें – नवरात्रि में मन, वाणी और कर्म से पवित्र रहें।
अनुशासन तोड़ना – व्रत या पूजा नियम अधूरे छोड़ना शुभ नहीं माना जाता।
अपवित्रता से बचें – जूठा भोजन या अस्वच्छ वस्त्र पहनकर माँ की पूजा न करें।
अलसीपन से बचें – नवरात्रि में आलस्य और निंद्रा अधिक लेना अशुभ माना गया है।

नवरात्रि में विशेष कामनाओं के लिए पूजा________अच्छी पत्नी प्राप्ति और शीघ्र विवाह के लिए –
दुर्गा सप्तशती की पुस्तक में से नित्य ‘अर्गला- स्तोत्र’ का एक पाठ करने से सुलक्षणा पत्नी की प्राप्ति संभव हो जाती है
धन प्राप्ति के लिए –
जिस भी घर में नवरात्रि को श्री सूक्त का पाठ प्रतिदिन होता है उस घर में कभी भी आर्थिक संकट नहीं आता है
नवरात्रि में देवी को पान के पत्ते में रखकर गुलाब की पंखुडियां अर्पित करने से भी स्थाई धन का लाभ होता है
जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए –
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और कपूर तथा लौंग से आरती करें
नित्य पूजा में मां दुर्गा को शहद एवं इत्र अर्पित करें
नवरात्रि में प्रातः राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करने से भी जीवन की बाधाएं दूर होती हैं
नवरात्रि के विशेष फलदायी दिन________ इस दौरान हर दिन विशेष शक्ति आराधना से विशेष लाभ की प्राप्ति की जा सकती है। जो लोग पुरे 9 दिन उपवास या साधना ध्यान या दान न कर पाएं वे भी इन विशेष दिनों में लाभ ले सकते हैं।
विशेष दिन और उनका महत्व
22 सितम्बर 2025 (सोमवार) – प्रतिपदा व घटस्थापना
नवरात्रि का प्रारंभ, माँ शैलपुत्री की पूजा। इस दिन कलश स्थापना और अखंड ज्योति जलाने से पूरे वर्ष सुख-समृद्धि बनी रहती है।
24 सितम्बर 2025 (बुधवार) – तृतीया
माँ चंद्रघंटा की पूजा। शत्रु भय और मानसिक क्लेश दूर करने वाला दिन। साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
27 सितम्बर 2025 (शनिवार ) – पंचमी
माँ स्कंदमाता का पूजन। संतान सुख और परिवारिक उन्नति का विशेष दिन। घर-परिवार में सुख-शांति बढ़ती है।
29 सितम्बर 2025 (सोमवार ) – सप्तमी
माँ कालरात्रि की पूजा। नकारात्मक शक्तियों और ग्रहदोष से मुक्ति का विशेष योग। यह दिन तंत्र-साधना और उन्नति के लिए श्रेष्ठ है।
30 सितम्बर 2025 (मंगलवार) – अष्टमी
दुर्गा अष्टमी और कन्या पूजन। इस दिन कन्याओं का पूजन और भोग अर्पण करने से माता की विशेष कृपा मिलती है। रोग-शोक और संकट दूर होते हैं।
01 सितम्बर 2025 (बुधवार) – नवमी
महानवमी का पर्व। माँ सिद्धिदात्री की पूजा। सभी प्रकार की सिद्धियों और अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए शुभ दिन।
02 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) – विजयादशमी
बुराई पर अच्छाई की विजय का दिन। इस दिन शस्त्र-पूजन और देवी विसर्जन होता है। नए कार्य का शुभारंभ करने से सफलता सुनिश्चित होती है।

नवरात्रि में समस्या निवारण हेतु उपाय_______ जो लोग किसी समस्या के पीड़ित है वे उनकी समस्या निवारण हेतु सुझाये गए उपाय अनुसार पूजा पाठ करे -,,,,,,,,,,,यदि आप क़र्ज़ के चलते परेशान हैं तो नवरात्रि के पहले दिन से अंतिम दिन तक लगातार मंगल ऋणमोचक स्त्रोत का पाठ करें।,,,,,,,,,,,,,,यदि आप किसी पुरानी बीमारी के चलते परेशान चल रहे हैं तो नवरात्रि में राम रक्षा स्त्रोत का पाठ नियमित रूप से प्रारंभ कर दें।,,,,,,,,,,,,स्थाई लक्ष्मी निवास के लिए नवरात्रि मे श्रीसूक्त का पाठ तुरंत असरदायी होता है।,,,,,,,,,,,,,जो जातक राहु, केतु और शनि ग्रह की पीड़ा से परेशान हैं, उनके लिए नवरात्रि मे माता काली की साधना लाभदायक होगी।,,,,,,,,,नवरात्रि मे देवी के अथर्वशीर्ष का पाठ करने से सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है तथा ऐश्वर्य की भी प्राप्ति होती है।,,,,,,,,,,,,,अगर आपका वैवाहिक जीवन सही नहीं चल रहा है तो माता के मंदिर मे नवरात्रि के नौ दिन तक लगातार माता पार्वती और भगवान शिव का पंचोपचार पूजन करने से शांति मिलेगी।,,,,,,,,,,,,,मनवांछित विवाह के लिए नवरात्रि में भगवान शिव का शहद से अभिषेक करें तथा माता पार्वती को लाल चुनरी अर्पित करें।,,,,,,,,,,,,यदि आपके आस पास नकारात्मक उर्जा है और आप उससे छुटकारा पाना चाहते हैं तो नवरात्रि मे भैरव मंदिर मे दीप दान करें।,,,,,,,,,,,,,यदि धन की कमी से परेशान हैं तो नवरात्रि के पहले दिन 11 लघु नारियल एक लाल कपड़े को बिछाकर उस पर रख दें और नौ दिन तक उनकी पूजा करें। फिर नवरात्रि के आखिरी दिन उसे अपने धन स्थान पर रख दें। इससे लक्ष्मी का स्थाई वास होगा और धन से जुड़ी समस्या भी दूर होगी। ______जो लोग संतान सुख को लेकर चिंतित हैं, वे नवरात्रि मे माता भुवनेश्वरी की पूजा उपासना करें।

इस बार नवरात्रि मनाएं वास्तु के संग,,,,,,,,,इस बार अगर आप नवरात्रि के त्योहार को वास्तु के संग मनाएंगे तो सोने पे सुहागे वाली कहावत चरितार्थ होगी। आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस देवी मां के रूपों के अनुसार ही उनकी दिशा में अगर आप उपासना करते हैं तो फल हजारों गुना बढ़ जाता है। -,,,,,,,,,प्रतिपदा (22 सितंबर 2025, सोमवार) – माँ शैलपुत्री,,,,,,वास्तु दिशा: पूजा घर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में रखें।,,,,,,,,,उपाय: कलश स्थापना में उत्तर-पूर्व दिशा का ध्यान रखें। तांबे का कलश भरकर उसमें जल और सुपारी डालें।,,,,,,,,,विशेष: घर में अक्षय ऊर्जा बनी रहेगी और माता की कृपा हमेशा बनी रहेगी।,,,,,,,,,,,,,,, द्वितीया (23 सितंबर 2025, मंगलवार) – माँ ब्रह्मचारिणी,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजा स्थान में उत्तर या उत्तर-पूर्व।,,,,,,,,उपाय: सफेद वस्त्र पहनें, सफेद फूल और मिश्री का भोग लगाएँ।,,,,,,,,,,विशेष: ज्ञान, शिक्षा और मानसिक शांति बढ़ती है।,,,,,,,, तृतीया (24 सितंबर 2025, बुधवार) – माँ चंद्रघंटा,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर का पूर्व या उत्तर-पूर्व भाग उत्तम।,,,,,,,उपाय: हरे रंग के कपड़े पहनें, हरे पत्ते, इलायची और हरा फल अर्पित करें।,,,,,,,विशेष: शत्रु भय, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।,,,,,,,,,,,, तृतीया (25 सितंबर 2025, गुरुवार) – माँ चंद्रघंटा,,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर का पूर्व या उत्तर-पूर्व भाग उत्तम।,,,,,,,,उपाय: हरे रंग के कपड़े पहनें, हरे पत्ते, इलायची और हरा फल अर्पित करें।,,,,,,,विशेष: शत्रु भय, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है,,,,,,,,,,,,, चतुर्थी (26 सितंबर 2025, शुक्रवार) – माँ कुश्मांडा________वास्तु दिशा: पूजाघर या आंगन का पूर्व और उत्तर-पूर्व।,,,,,,,,उपाय: मिट्टी या चाँदी के पात्र में जल डालकर पूजा करें।,,,,,,,,,,विशेष: स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और भौतिक उन्नति के लिए उत्तम।,,,,,,,,,, पंचमी (27 सितंबर 2025, शनिवार) – माँ स्कंदमाता,,,,,,वास्तु दिशा: उत्तर-पूर्व दिशा में विशेष दीपक जलाएँ।,,,,,,,,उपाय: लाल वस्त्र पहनें, सूर्य उदय के समय लाल फूल और गेंहू का भोग लगाएँ।,,,,,,,,,विशेष: संतान सुख, परिवारिक शांति और सम्मान बढ़ता है।,,,,,,,,,, षष्ठी (28 सितंबर 2025, रविवार) – माँ कात्यायनी,,,,,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर का पूर्व या उत्तर-पूर्व कोना।,,,,,,,उपाय: पीले फूल और हल्दी का तिलक करें। ब्राह्मण कन्याओं को भोजन कराएँ।,,,,,,,,,विशेष: करियर और शिक्षा में सफलता के लिए उत्तम दिन।,,,,,,,,,, सप्तमी (29 सितंबर 2025, सोमवार) – माँ कालरात्रि,,,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर में उत्तर-पूर्व या पूरब की दिशा।,,,,,,,,,उपाय: दीपक में सरसों का तेल डालकर जलाएँ, लौंग चढ़ाएँ।,,,,,,,,,विशेष: नकारात्मक ऊर्जा, भय और बाधा दूर होती है।,,,,,,,,,, अष्टमी (30 सितंबर 2025, मंगलवार) – माँ महागौरी,,,,,,,वास्तु दिशा: उत्तर-पूर्व या पूजाघर का कोना।,,,,,,,,,,,,उपाय: सफेद वस्त्र पहनें, नारियल, कपूर और चंदन अर्पित करें।,,,,,,,,,,विशेष: शांति, सौभाग्य और मानसिक संतुलन के लिए उत्तम।_________अन्य: कन्या पूजन विशेष महत्व रखता है।,,,,,,,,,,, नवमी (1 अक्टूबर 2025, बुधवार) – माँ सिद्धिदात्री,,,,,,,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) सर्वोत्तम।,,,,,,,,उपाय: पीले फूल, गुड़ और मिठाई अर्पित करें। गुरुजनों का आशीर्वाद लें।,,,,,,,,,,विशेष: सभी प्रकार की सिद्धियाँ, लक्ष्मी की कृपा और धन लाभ के लिए उत्तम दिन।,,,,,,,,,,,,,,,,,_________ विजयादशमी (2 अक्टूबर 2025, गुरुवार),,,,,,,,,,वास्तु दिशा: पूजाघर या मुख्य द्वार का पूर्व या उत्तर।,,,,,,,,उपाय: देवी विसर्जन और शस्त्र पूजन करें। नए कार्य का शुभारंभ करें।,,,,,,,,,,विशेष: बुराई पर अच्छाई की विजय का दिन। घर में समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है।
सुझाव:______पूजाघर हमेशा स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखें।,,,,,,,हर दिन पूजा करते समय वास्तु दिशा का ध्यान रखें।,,,,,,,,दीपक जलाने और फूल चढ़ाने में सात्त्विक रंगों (सफेद, लाल, पीला, हरा) का प्रयोग करें।,,,,,,,,,,,,,जरूरतमंदों को दान और कन्याओं को भोजन देना शुभ होता है।

